हर दिन बदलती है मंजिले
हर पल बदलती है राहें
सोचता तो है बहुत कुछ मगर
नहीं होता जो इंसान चाहें
गुरवत के अक्सर दरमियान
बदल जाती है सबकी निगाहें
मत घबरा हरमन होगी रहमत
जब खोली खुदा ने अपनी बाहें
कलम : हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )