Archive for the ‘HINDI’ Category

अभी तो हमसफ़र साथ था
हाथो में उसके मेरा हाथ था
नजरों से नजरे मिल रही थीं
लफ्ज कहने मैं जुबान का ना साथ था
होश उड़ चुके थे कब के
फांसला दरमियाँ भी ख़ाक था
जुल्फों की बन गयी थी काली घटाए
बादल उम्मीदों का बरसने को बेताब था
कोई वजह ना थी उनके आने की
सोचा ये तो बस एक इत्तिफाक था
फिर लगा कि सब हकीकत थी
आँख खुली तो देखा हसीन ख्वाब था
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
बदनाम हुए इस कदर
के नाम भी हो गया
पहले तो छुपाता था नज़रें
अब शरेआम हो गया
पहले थी नसीहते कभी कभी
रोज का अब पैगाम हो गया
महखाने से था ना कोई वास्ता
अब लबो को सहारा-ऐ-जाम हो गया
पहले ना थी कभी फुर्सत हमें
अब वक़्त का हर पहलू गुलाम हो गया
पहले थी तमन्ना अधूरी सी
अब समंदर-ऐ-चाहत उफान हो गया
कभी रोशिनी का उजाला था हर तरफ
अब अंधेरो मैं ऐसा गुमनाम हो गया
कभी आसमान में तारे थे बेशुमार
चंद हसरतों का गुम वो चाँद हो गया
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
क्या करते हो बात ऊँचाइओ की
रोज आसमानों को छू लिया करते है
क्या करते हो बात इम्तिहानो की
रोज मुश्किलों का सामना किया करते है
क्या करते हो बात आशिअनो की
रोज बाहर रात बसर किया करते है
क्या करते हो बात तन्हाईयो की
रोज खुद ही से बातें किया करते है
क्या करते हो बात पैमानों की
रोज जी भर के पिया करते है
क्या करते हो बात ज़माने की
रोज लाखो ही सितम लोग किया करते है
क्या करते हो बात ज़ख्मो की
रोज कितने अपने हाथो से सिया करते है
क्या करते हो बात चले जाने की
रोज मर मर के जिया करते है
कलम:- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
ऐ दुनिया के रखवालो
पहले अपना देश बचा लो
पीछे एक नज़र तो डालो
बिगड़ते हालात को संभालो
घर मैं कोई सेफ नहीं है
पुलिस पर किसी को फैथ नहीं है
निपटे लाखो केस नहीं है
कम होती नेताओ की ऐस नहीं है
लडकियों की कोई कद्र नहीं है
लम्बी उनकी उम्र नहीं है
खुद को सोचो मैं मत डालो
कैद से उनको बाहर निकालो
चारो तरफ गरीबी फैली है
हर शेय लगती मैली मैली सी है
सरकार की नीतिया पहली सी है
हर गली दहशत से देहली सी है
बोर्डर पर सैनिक मरते है
कितने ही घर उजड़ते है
लोग खौफ मैं जीते मरते है
फ़रियाद खुदा से रोज करते है
दिल मैं सबके पाप है
चेहरे पर नकली नकाब है
इरादे भी नापाक है
नहीं मिलते तभी तो इन्साफ है
कहीं पर कोई तरक्की नहीं है
गालिया-सड़के पक्की नहीं है
खुद को समझता कोई लक्की नहीं है
गंदगी फ़ैलाने मैं दुनिया थकती नहीं है
अरे छोड़ो जो मन है बुरी बात
जो है सब्र करो मत रखो झूठी आस
बुरे वक़्त मैं दो सबका साथ
बाजवा फिर हो सकती है नयी प्रभात
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
निगाहे किसी और को है
निशाना बने कोई और
अदाये किसी और को है
दीवाना बने कोई और
दिल किसी और को है
दिलदार बने कोई और
चाहत किसी और से है
प्यार करे कोई और
वादा किसी और से है
इंतज़ार करे कोई और
मतलब किसी और से है
शिकार बने कोई और
शम्मा किसी और की है
परवाना बने कोई और
गलती किसी और की है
सजा भरे कोई और
नाम किसी और का है
बदनाम होए कोई और
कलम:- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
मैं शिद्दत्त से जिनके लिए लिखता रहा
कभी गौर से उन्होंने पढ़ा ही नहीं

वो समझे हर बार कलम नयी ही थी
मैंने मुद्दत्त से श्याही को भरा ही नहीं

जैसे पेड़ पर लगे हो फल बेशुमार
किसी शक्श के हाथो कोई लगा ही नहीं

बाजवा अभी तो लिखना सिखा ही है
इल्म शायरी का तभी तो चढ़ा ही नहीं

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

ज़माने का देखा है
मैंने एक दस्तूर
जिसने की कोशिश उठने की
वो दबा है बदस्तूर
समझो तो आज़ाद परिंदा है
ना समझो तो मजबूर
दिखती हो मंजिल जब सामने
होती है असल में दूर
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
जलते हुए को देख कर
भी ना उनसे रहा गया
के पास आये मेरे और
हाथ सेक कर चल दिए
उम्मीद तो थी शायद
के मुझे बचा लेंगे
पर उन्हें कोई फर्क ना था
के कौन जल रहा था
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
उनकी अदा का जब महफ़िल मैं जिकर होता है
सीने मैं एक मीठा सा दर्द होता है
नाम आते है कईयो के फिर सामने
हर शक्श के चेहरे पर फिकर सा होता है
ना जाने किस वार से लूट लेती है ये
हर गुजरने वाला इनका मुरीद होता है
हरमन फिर गरीब कोई बेवजह से पकड़ा जाता है
असल मैं तो कत्ल इन्ही के हाथों से होता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
सपने में देखा तो लोग ईमान बदल रहे थे
नकली अपनी शख्शियत की पहचान बदल रहे थे
सबका बने विश्वास वो जुबान बदल रहे थे
जो सचाई के थे साथ वो पैगाम बदल रहे थे
कुछ ऐसे भी थे लोग वहां जो अरमान बदल रहे थे
ज़माने से जो खड़े थे पैरो के निशान बदल रहे थे
सब देख रह था “हरमन” पर कुछ भी न कर पाया
क्यूँ की जिनको थी उम्मीद उनके अंजाम बदल रहे थे
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )