Archive for the ‘HINDI’ Category

इश्क की मुश्किल राहो में
वो अकेला हमें छोड़ गए
बरसो की तोड़ के मोहब्बत को
रिश्ता संग दुखो के जोड़ गए
जो माँगा हमनें जवाब इसका
वो हस के पल्ला झिंझोड़ गए
वो करके तबाह मेरी उम्र सारी
कश्ती तूफानों की और जो मोड़ गए
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
मैं चिराग हाथों में लेकर
उजाले हर जगह ढूँढता रहा
ना एहसास था जरा भी
अँधेरे साथ साथ चल रहे थे
मैं खड़ा था जो लिए
कश्ती को एक ही जगह पर
पर किनारे भी तो अपनी जगह
बार बार बदल रहे थे
कलम -: हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
यूँ लगा कुछ खो रहा है
कोई अपना जुदा हो रहा है
मन भी उदास हो रहा है
वक़्त जो वो करीब हो रहा है
ये एहसास भी हो रहा
क्यूँ ये सब हो रहा है
कोई जोर नहीं किसी का किसी पर
सब लेखो का “हरमन” हिसाब हो रहा है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
मुश्किलों ने था ऐसा घेरा
के मैं बिल्कुल टूट गया
तन्हाईयो का भी था ऐसा फेरा
के उजालो से पीछे छूट गया
खुद की करनी का है ये फल
क्यूँ खुद से हरमन रूठ गया
अभी तो सितम है और भी बाकी
हौंसला अभी से बाजवा तेरा टूट गया
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कल रात को मैंने सोचा ये
क्यूँ ख्वाबो की मेरे ताबीर नहीं
जो दिखता है सब वो सच तो नहीं
फिर क्यूँ ये मुझे मंजूर नहीं
पाना चाहो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं
सब आसान है मंजिल दूर नहीं
क्यूँ रहता है कोसता खुदा को हर वक़्त
लकीर हाथ की है जो वो तकदीर तो नहीं
बना सकता है खुद मिटा सकता है खुद
कोई शहंशाह नहीं कोई फ़कीर नहीं
दिया सब कुछ है खुदा ने इंसान को मगर
क्यूँ दिखती उसे ” हरमन “असली तस्वीर नहीं
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

ऊँचा बैठ सदा

Posted: 17/09/2012 in HINDI

ऊँचा बैठ सदा नीच देखिए
और ना ऊँचा होए
“हरमन” ऊँचा हाथ ना पहुचे
नीच सदा सुखी होए
ऊँचा उठ ना भूलिए सब कुछ
पल में हस्ती खोए
ऊँचा उड़े परिंदा हर पल
धरती पे आसरा होए
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

 

 

 

लोगो ने सिखा दिया
चालाकी करना मुझे
वर्ना अपने भोलेपन से
हरमन अभी तक अन्जान था
ना जाने कहाँ से हुआ
मुश्किलों का आगाज
खुदा कसम अब से पहले
बड़ा ही इत्मीनान था
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

 

 

 

आग लगी थी

Posted: 04/09/2012 in HINDI

आग लगी थी चारो तरफ
सब कुछ जल रहा था
मेरा लुट गया था सब कुछ
उसका दिल ना पिघल रहा था
क्या देख कर ना जाने वाहा
उसका चेहरा खिल रहा था
मेरी साँसे थम रही थी
उसको सुकून मिल रहा था
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

 

 

 

नहीं देखती थी जो कभी
नजरे उठा कर मेरी तरफ
मिजाज उसके अब मुझे
बदले बदले से लगते है
लगता है के फैसला
कर लिया है उसने शायद
इसीलिए हम भी दिल को
समझा कर ही रखते है
कलम : हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

 

 

 

गम-ए-दौर

Posted: 19/08/2012 in HINDI
गम-ए-दौर का मंज़र भयानक ही सही
दुनिया मैं लोग बसते और भी है
मत बना बेबसी को कमजोरी अपनी
जरा गौर से देख रस्ते और भी है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )