Archive for the ‘HINDI’ Category

हुस्न वालो की अदाए होती है कातिल
जान आशिक कहाँ अपनी बचा पाता है

ये करते है ऐश इन्ही के दम पर
सादिक अपना सब कुछ लुटा जाता है

बिखेरते है जब वो अपनी ज़ुल्फो को
घटाओ को भी पसीना आ जाता है

मस्त नजरो का तीर जब चलता है
हर कोई निशाने पर आ जाता है

देख कर हरकतें इन जालिमो की
ईमान कसम से डगमगा जाता है

महफ़िल में हो या फिर और कही
जिक्र लबो पर उनका आ जाता है

दिल के खोटो का यही पेशा है हरमन
हुस्न जलवे अपने दिखा जाता है

खुदा डाले और मुसीबतों में बेशक बाजवा
हुस्न वालो के नाम से खौफ छा जाता है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

वो वक़्त क्या हसीं था
जब तू मेरा जानशीं था

आज वक़्त का जोर है
तेरे साथ कोई और है

दिल की सुनसान गलियों में
कैसा हरमन मचा ये शोर है

जिधर भी देखू नजरे उठा कर
सिवा तेरे ना चेहरा कोई और है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

जाने क्यूँ लोग रिश्तो को
यूँ दागदार करते है

होता नहीं है असल मैं
फिर भी प्यार करते है

जज्बातो की ना करके कद्र
दिखावा हर बार करते है

कर बदनामी ‘हरमन’ गली गली
पीठ पर कई वार करते है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

तेरी चाहत का असर अभी होना बाकी है
मर्ज-ऐ-इश्क के दर्द में रोना बाकी है
सूखी पलकों को अभी और भिगोना बाकी है
जहाँ से ना लौट पाए,राहो मैं खोना बाकी है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
तेरा मेरा रिश्ता
कुछ अजीब है
फांसले है बहुत पर
दिल के तू करीब है
तेरी हर अदा का
ये शक्श मुरीद है
तुझे पाना ही आजकल
मेरी तहरीज है
ज़माने की परवाह नहीं
मुझे जरा भी
तू ही दिल को मेरे
सबसे अजीज है
मालामाल है “हरमन”
तेरी मोहब्बत से
सिवा तेरे तो “बाजवा”
बहुत ही गरीब है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
ये जो ख़ामोशी है
खुद तो चुप रहती है
समझने वाला समझे तो
बिना बोले सब कुछ कहती है
दिल में दबी हो बात जो
चेहरे के राही कहती है
सहती है कितना कुछ देखो
अन्जान बनी फिर भी रहती है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
लोगो के जीने का
ढंग है बड़ा अजीब
कुछ रखते है चाहत बस
कुछ पाते है हर चीज
कुछ अपनों से बहुत दूर है
कुछ गैरों के है अज़ीज़
कुछ हालातो से हैं तंग बड़े
कुछ को खुशिया है सब नसीब
कुछ शर्म-ऐ -पर्दा के पीछे है
कुछ को भूली है तहज़ीब
कुछ मोड़ते है लहरों के रुख को
कुछ डूबने के है बहुत करीब
कुछ सहते है वार सीने पे
कुछ धोखे के है मुरीद
सब जद्दो-जेहद मैं है “हरमन”
तू भी निकाल “बाजवा” तरकीब
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
चाँद सितारे भी थे
और खूब नज़ारे भी थे
साथ देने को अकेले मेरा
बेबस किनारे भी थे
टूटे जो कईओ के
दिल बेचारे भी थे
जो बची उनकी यादो के
अब तो सहारे ही थे
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
 
मजबूरी का नाम ले कर अक्सर लोग बहाने बना लेते है
होता है एक ही तीर पर कई निशाने बना लेते है
हुस्न वाले कातिल अदाओ से दीवाने बना लेते है
कुछ बन जाते है अपने कुछ को बैगाने बना लेते है
कुछ छोड़ नहीं पाते महफ़िल को तमाम उम्र
कुछ रोज ही नए ठिकाने बना लेते है
कुछ रखते है याद बचपन के भी दोस्तों को
कुछ लोग रोज ही नए फ़साने बना लेते है
कुछ लूट कर औरो की मलकियत को
खुद अपने नए घराने बना लेते है
कुछ करते है जाहिर ना-समझ खुद को
वक़्त आने पर ऐसे हालात सियाने बना लेते है
कुछ लुटाते है अपने दोनों हाथो से
कुछ छुपाने को दौलत तहखाने बना लेते है
कुछ रहते है कैद किसी और के ख्यालो मैं
कुछ औरो के लिए कैद खाने बना लेते है
कुछ रहते है नापते रिश्तो को माप-तोल मैं
कुछ निभाने को उनको अलग पैमाने बना लेते है
कुछ सीख नहीं पाते समझाने के बावजूद भी
कुछ जरा सी नसीहत को ता-उम्र पैगाम बना लेते है
कुछ रहते है महलो मैं गरीबो की तरह
कुछ सादगी से झोपड़ो को आलीशान बना लेते है
कुछ रखते हैं छुपा कर दिलो मैं नफरते
कुछ पहली ही नज़र मैं पहचान बना लेते है
कुछ जीत नहीं पाते कोशिशो के बाद भी
कुछ होंसलो से ऊँचाइयो के नए आयाम बना लेते है
कुछ उठाते है मोल खतरे आसान राहो मैं
कुछ मुश्किल राहो को भी आसान बना लेते है
कुछ ढूंढते रहते है खुदा को हर तरफ
कुछ अपने अंदर ही उसका मुकाम बना लेते है
कुछ रखते है अपनी शकशियत को अच्छाई की और
कुछ बुरे कर्मो से खुद को शैतान बना लेते है
कुछ तोड़ते हैं कलियों को खिलने से पहले
कुछ औरो के गुलशन को गुलिस्तान बना लेते है
कुछ रखते है फर्क दिल मैं जात मज्हबो का
कुछ इंसानियत दिखा के खुद को इंसान बना लेते है
कुछ लोगो पर असर करती है ये सब बातें
कुछ लोग बस बात इसे आम बना लेते है
कुछ करते है मदद ऐ “हरमन” खुले दिल से
कुछ जरा सी को ज़िन्दगी भर का एहसान बना देते है
“मुस्तापुरिया” ये कमबख्त हालात चीज़ है ऐसी
के बुरे को अच्छा और अच्छे को बुरा इंसान बना देते है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
हम जवाब मैं उसके
बड़े ही बे-सबर थे
दिया जवाब जो ना का
उस से भी बे-खबर थे
रुसवा करके वो हमें
बड़े इत्मीनान से चल दिए
मिले ज़ख़्म जो इश्क में थे
वक़्त की सुई ने बेरहमी से सिए
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )