Archive for the ‘HINDI’ Category

ना था एहसास दर्द का तुझको
इसी लिए तू सितम करती रही

नजरे छुपा कर बातें करना
औरो से छुप छुप के मिलती रही

वादे करना और फिर उन्हें तोड़ देना
तुने आदत कुछ ऐसी बनाई

कुछ भी ना रहा मेरे पास ऐ ज़ालिम
बची तो सिर्फ तेरी याद और मेरी ये तन्हाई

अब तू ही बता क्या नाम दूँ इसे
तेरी रुसवाई या फिर बेवफाई

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

इक ख्वाब देखा कल रात मैंने
जिसे पूरा करने की ख्वाहिश है

अभी तो इज़हार ऐ इश्क हुआ है
बाकी होनी आजमाईश है

तू हो कर रहना मेरी बस
ये ही तुझ से मेरी गुज़ारिश है

आकर सिमट जा मेरी बाँहों में
के वक़्त की भी ये फरमाईश है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

हर पल तुझ ही को याद करता हूँ
तेरी हर बात पर खुद को राख करता हूँ

मिटा देना चाहता हूँ खुद को तेरे इश्क में
इस्सी लिए तेरी हर गलती को माफ़ करता हूँ

करे तू भी कभी प्यार मुझे
खुदा से बस ये ही फरियाद करता हूँ

करते है तंग ज़माने वाले रोज ही मुझे
कुछ भी तो नहीं मैं ब्यान करता हूँ

तुझ ही को पाने की हसरत है दिल में मेरे
इसी लिए तो हर बार खुद ही को बर्बाद करता हूँ

कलम:- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
दवा दारू से ना काम चलेगा
मेरा मर्ज बहुत ही गहरा है

सब हकीमो ने भी दे दिया जवाब
जब से उसने फेरा चेहरा है

जा कर कह दो उस जालिम से
के उसकी याद का ही पहरा है

नहीं निकलेगा दम तब तक
जब तक वो मिलने ना आई

के उसकी हसरतो के शौंक पर ही तो
तमाम उम्र है मैंने अपनी गवाई

कलम:- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

शाम होते ही महफ़िल सजा लेता हूँ
जाम भर के लबालब होठों से लगा लेता हूँ

नहीं होता महखाने मैं कोई और
मैं खुद ही बोतल उठा लेता हूँ

होता हूँ हमेशा ही तनहा और अकेला मैं
साथ पीने को दर्दो को बुला लेता हूँ

हर दर्द अपनी कहानी सुना जाता है
बीता हुआ अतीत फिर से याद आ जाता है

कोशिश करता हूँ भुलाने की बहुत
ना चाहते हुए भी फिर से दर्द जगा जाता है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
राहें आसान नहीं है इश्क की
अक्सर लोग डगमगा ही जाते है

जो लोग रखते है वफ़ा की उम्मीद
अक्सर वो दोखा खा ही जाते है

जो कर लिया इश्क फिर एक दफा तो
वो लौट के वापिस कहाँ जा पाते है

शीशा जैसा नाजुक दिल होता है
लोग तो पत्थर बरसा ही जाते है

पीते है जाम दर्दो का हर पल वो
जो सितमगर को कहाँ भुला पाते है

सच्ची मोहब्बत कौन करता है यहाँ
जो करते है वो इतिहास बना जाते है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
सोच में फर्क पड़ जाता है
इंसान मुश्किलों में जब पड़ जाता है
निकल नहीं पाता इन गहराइयों से
इस तरह से उसमें धंस जाता है
चाहता तो है मुश्किलों से लड़ना
पर वक़्त के आगे हर जाता है
तमाम उम्र करता है कोशिशे
गुमनाम होकर अंत में मर जाता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
शुकर गुजार हूँ उनका
जो इस काबिल बना रहे है
 इस अदब सी नाचीज को
उड़ना सिखा रहे है
बादल मुश्किलों के काले है
मेहनत से जो हटते जा रहे है
साथ मिला जो ऐसे दोस्तों का
हर पल मेरा साथ निभा रहे है
 कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
मुश्किलों का दौर था
बद्द दुआएं मिल रही थी
गलतियाँ भी हो रही थी
खता भी दोनों की ही थी
ना दूर हो पायी ग़लतफ़हमियाँ
दूरियां भी बढ़ रही थी
रुसवा हमने भी नहीं किया
और बेवफा वो भी ना थी
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कुछ तो कह कर जाती के
शायद बात बन जाती
गर मैं भी चुप ना रहता
तो  कहानी पूरी हो जाती
कुछ कहना था शायद उसको
हर बार ही लेकिन रुक जाती
मांगता रह हर पल मैं उसको
काश के मेरी बन जाती
लगता है कोई मजबूरी थी
यूँ रुसवा कर के ना जाती
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )