Archive for the ‘HINDI’ Category

राहे तकना तारे गिनना
सादिक काम हमारा है

उनके लिए तो होने वाला
रोजाना का एक मुजाहिरा है

हर शय गवाह है इस बात की
तेरा नाम ही हरमन ने पुकारा है

पर मेरी डूबती हुई कश्ती को
नहीं मिलने वाला कोई किनारा है

फिर भी बच गया हूँ जाने कैसे
मौला तेरा ही तो सहारा है

वर्ना उस ज़ालिम ने तो मुझे
तडपा तडपा के मारा है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

जहान से रुक्सत होने की जो रिवायत है
वो ही खुदा की सबसे बड़ी नियामत है
यूँ तो हाज़ारो ढंग है जीने के हरमन
पर विदाई की सिर्फ एक ही कवायद है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
साजिश है चाँद लोगो की
मुझे नीचा दिखने की
तमाम उम्र की मेहनत को
धोखा बता के मिटने की
मेरी बनी बनाई हस्ती को
ऊपर से निचे गिराने की
कुछ की है दुआए साथ में
कुछ बद्द-दुआए भी है
कुछ खड़े है हक़ में मेरे
और बहुत मेरे खिलाफ भी है
ना जाने कितनो को दगा दिया है
ना किया किसी से इन्साफ भी है
बहुतों ने किया है तंग मुझे
मेरी गलती का मुझे एहसास भी है
कहते है ये सब लोग मुझे
के इरादे मेरे नापाक भी है
फिर भी खुदा की रहमत का
शायद होना अभी एहसास भी है
मेरी सजा ना जाने कैसी होगी
बाकी मिलना खुदा का अभी जवाब भी है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
तबीयत से हूँ नासाज और मन भी है उदास
किस्मत को लेकर आजकल हूँ थोडा सा नाराज
क्यूँ मिलता नहीं जो चाहता हूँ मैं
खुदा की रजा के भी हूँ मैं खिलाफ
कोशिशे भी करता हूँ बेहिसाब
मेरा दामन भी है बिल्कुल साफ़
फिर सोचता हूँ क्या अकेला हूँ मैं
जिसके साथ नहीं हुआ इन्साफ
शिकायते भी रोज ही करता हूँ
उसके हर सवाल का भी है जवाब
इबादतें भी रोज ही करता हूँ
हर हाल मैं रखता हूँ उसको याद
हर कण कण में तू कहते है बसता
फिर क्यूँ फिरता है हरमन बदहवास
गर उसकी रजा में ही क़ज़ा है तो
कब पूरे होंगे ये मेरे सब खवाब
कलम : हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
गुजर रह हूँ नाजुक हालातो से
और वक़्त भी साथ नहीं दे रहा

टूटा हूँ जैसे आसमान से तारा
जो किसी को दिखाई नहीं दे रहा

बन गया हूँ खिलोने के जैसा
होर कोई मुझसे है खेल रहा

सब चले गए है साथ छोड़कर
मैं फिर भी सब कुछ झेल रहा

माना के ऐसा भी होता है अक्सर
जैसे खुद को कोई बेच रहा

खुशियाँ तो बीती हँस हँस के
अब दुःख भी दस्तक है दे रहा

होगा ना मुनासिब अब सोच के ये
क्यों पीछे मुड़ मुड़ के मैं देख रहा

जब होगी छाओं तब मिल ही जाएगी
फिलहाल तो धूप मैं सेक रहा

कलम : हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

आसमां में तारे है बेशुमार
हमें भी तुमसें है उतना प्यार

दिल की धड़कन से पूछो जरा
हर वक़्त जो रहती है बेक़रार

जर्रा जर्रा रोम रोम में तुम ही हो समाए
चाहते तो है बहुत तुम्हे पर इज़हार न कर पाए

कैसे कहे कुछ न सूझे कैसे तुम्हे बताए
देख तुम्हारी अदाए ज़ालिम दिल को रखते है समझाए

काश के ऐसा हो तुम आँखों की भाषा समझ सको
वर्ना खामोशी में हमारी ज़िन्दगी ना गुज़र जाए

कलम : हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

 

मौत ने कहा इंसान से
के मेरे नाम आते ही ज़ुबान पर
होश सबके ही उड़ने लगते है
जीते है जो खुश हो हो कर
मौत से पहले डरने लगते है
सादिक बोला मौत से
न जाने क्यों लोग डरते है
चेहरे सबके उतरने लगते है
हमको जीने का शौंक नहीं
ना ही हम मौत से डरते है
फिर कहा मौत ने
मेरी दहशत है ही इतनी
हर कोई घबरा जाता है
मेरा ख्याल आते ही
हर कोई पगला जाता है
सादिक बोला के
कुछ लोग ही रोते है याद करके
बाकि तो सब खुश होते है
फिर किस बात का खतरा है
ना जाने क्या ऐसा खोते है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

 

दोस्तों के संग बिताये वो दिन याद आते है
कॉलेज की पढाई को भी कहाँ भूल पाते है
न भूलता है वक़्त जो ऐसे ही गवाया था
माँ ने पिताजी की डांट से जब हमें बचाया था
एक ही बाईक़ पर तीन तीन सवार हो जाया करते थे
ना जाने कैसे कैसे करके तेल भरवाया करते थे
शहर की हर गली का चक्कर हमने जो लगाया था
कितनी ही लड़कियों पर किस्मत को अजमाया था
हर कोई चली जाती थी हमसे मुह मोड़कर
पर ना हार मानने का बीड़ा हमने उठाया था
सारा दिन निकलता था मौज मस्ती में
सब ही तो सवार थे एक ही कश्ती में
इधर उधर घूम के सारा दिन काट लेते थे
सारी खुशियाँ और गम आपस में बाँट लेते थे
हॉस्टल के रूम में महफ़िल रोज ही लगती थी
वो ही पुरानी बातें करके खूब मस्ती होती थी
पूरा था भरोसा हमें दोस्तों की दोस्ती पर
लड़ने को रहते थे हर वक़्त ही बेसबर
दिल करता था तो क्लास लगा लेते थे
वर्ना सारा वक़्त कैंटीन में बिता देते थे
गुज़र जाता था वक़्त यूँ ही बातें करके
रात को लौटते थे घर डेडी से डरते डरते
सारा साल हमारा बस यूँ ही गुज़र गया
इम्तिहान भी नक़ल मार के जैसे तैसे निकल गया
फिर आया वक़्त जिसका सभी को इंतज़ार था
कुछ ने कहा बस कुछ का आगे बढ़ने का विचार था
कुछ ने मनाई खुशियाँ कुछ का मातम वाला हाल था
क्यूकि फिर से लगने वाला उनका एक और साल था
हम भी निकल गए भीड़ में जिसका ना हमें इतबार था
ज़िन्दगी का एक नया दौर कर रहा जो इंतज़ार था
सब को अलविदा कहकर हम भी पीछे मुड़ गए
जान से प्यारे दोस्त मुझसे न जाने कहाँ बिछड़ गए
जान से प्यारे दोस्त मुझसे न जाने कहाँ बिछड़ गए …
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कुछ ज़िन्दगी मेरी गुज़र गयी
तुम्हे अपना मुझे बनाने में

कुछ और ज़िन्दगी निकल गयी
प्यार साबित करके दिखाने में

फिर गुज़रा समां ना पता लगा
तुम्हे रूठे से मानाने में

बाकी बची थी जो ज़िन्दगी
वो बीती मेरी महखाने में

अब देर ना कर थोडा वक़्त बचा है
ऐ संग-दिल हरमन को दफ़नाने में

कलम :- हरमन  बाजवा  ( मुस्तापुरिया )

दिल में जो….

Posted: 07/01/2012 in HINDI
दिल में जो छुपा दर्द था
वो आज बहार निकल आया

कोशिश तो की थी बहुत मैंने
पर खुद को ना रोक पाया

कदम बढ़ गए अपने आप
पर ना मंजिल पर पहुच पाया

सोचा था दर्द बाँट लूँगा
पर किसी ने ना मुझे बुलाया

बड़ी मुश्किल थी वो घडी
यह रास्ता था जब अपनाया

खुशियों से मुह मोड़ के हरमन
बरबादियों में निकल आया

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )