Archive for the ‘HINDI’ Category

निभाना नहीं चाहती थी मेरे साथ वो
शायद रोज इसी लिए बहाने ढूंडा करती थी
भरोसा नहीं था उसको मेरे प्यार पर शायद
इसी लिए गैरों की बातें किया करती थी
देखा था मैंने अक्सर उसको निगाहे चुराते हुए
ना जाने किसके लिए दुआए किया करती थी
कर दिया था मैंने तो नाम उसके अपना सब कुछ
इक वो थी जो फकत हमें अपना कहने से डरती थी
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
दीए भी बुझा देता हूँ
रोशिनी को भी मिटा देता हूँ
 लगता है डर उजालो से
परदे भी गिरा देता हूँ
अंधेरो के साए में
अक्सर वक़्त बिता देता हूँ
 इस कदर से मिले है धोखे मुझको
परछाइयों को भी दूर भगा देता हूँ
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
शम्मा ने कहा परवाने से
हुसन ने कहा दीवाने से
आखिर क्या बात है ऐसी मुझ में
जो रुक्सत हुए तुम ज़माने से
शम्मा से कहा परवाने ने
हुसन से कहा दीवाने ने
तेरी चाहत मैं है मज़ा इतना
ज़िन्दगी भी थोड़ी है संग बिताने में ..
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
तेरे नजदीक आना चाहता हूँ

में खुद से दूर जाना चाहता हूँ

तुझे बाँहों में समाना चाहता हूँ

सारा जहाँ पाना चाहता हूँ

हवा भी ना गुजरे होकर दरमियाँ से

इस कदर से दूरियां मिटाना चाहता हूँ

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
तेरी दोस्ती का सिला
हम यूँ अदा करेंगे
के मरते दम तक
हम तेरे साथ रहेंगे
तेरी हर हसरत को
पूरा हम करेंगे
और कभी किसी बात का
गिला नहीं करेंगे
जब भी तू नाराज होगा
तुझे मनाते रहेंगे
के ये सिनसिला हम
कभी ख़तम नहीं करेंगे
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
दे सकते थे जवाब हम भी
उनकी बेवफाई का मगर
जब आई उनकी भोली सूरत सामने
तो हम बेजुबान हो गए
नाम तो बहुत था
हमारा भी शहर मैं लेकिन
जब हुए चर्चे उनके तो
हम गुमनाम हो गए
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

मर ही जाऊ …

Posted: 17/12/2011 in HINDI
मर ही जाऊ तो अच्छा है
अब जी कर क्या करूँगा
कब तक आखिर इस ज़माने से
यूँ ही लड़ता रहूँगा
हिम्मत टूट गए है मेरी
कोशिशे सब नाकाम है
मरने के बाद न जाने क्या होगा
शायद जीना इसी का नाम है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
धुआं सा उठ रह था
के मनो कुछ जल रह था
मेरा चमन उजाड़ गया
लोगो का दिल बेहाल रह था
ना इस बात का था गुमान
के अपना कोई बिछड़ रह था
बस ऐसे लग रह था मनो
सांस होले होले उखड रह था
रोया था उस लम्हे को याद करके
दिल अभी भी मेरा तड़प रह था
पल भर में हुआ तबाह सब कुछ ऐसे
के होश मेरा अभी तक ना संभल रह था
फिरता रह हरमन बदहवास होकर
ना जाने कब से भटक रह था
बदल गया जैसे सब एक ही रात में
ना जाने वक़्त कैसे गुज़र रह था .
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
बहुत थक गया हूँ अब तो थोडा आराम चाहता हूँ मैं
चारो तरफ है शोर शराबा थोडा इतमिनान चाहता हूँ मैं
बांटा है दर्द दुनिया का बहुत थोडा सुकून चाहता हूँ मैं
खुद को तन्हा पाता हूँ आजकल अब कोई हमसफ़र चाहता हूँ मैं
मिली है शोहरत भी बहुत मुझे थोडा गुमनान होना चाहता हूँ मैं
लोगो ने दिया है प्यार बहुत कोई नया पैगाम चाहता हूँ मैं
अंधेरो के साये में रह हूँ अब तक रोशिनी का कोई निशान चाहता हूँ मैं
कांटो से भरे रास्ते थे आखिर तक फूलों का नरम एहसास चाहता हूँ मैं
बिछड़े अपने इस ज़िन्दगी के सफ़र में अब नये लोगो का साथ चाहता हूँ मैं
रहती है मसरूफियत हर पल ही बहुत वक़्त खुद के लिए निकलना चाहता हूँ मैं
बांटे कोई आकर दर्द मेरा भी पीडो से छुटकारा चाहता हूँ मैं
बदले है ज़माने के रीत और रिवाज़ नये दौर का आग़ाज़ चाहता हूँ मैं
टूट कर बिखरा हूँ टुकडो में फिर से एक होना चाहता हूँ मैं
बहुत थक गया हूँ अब तो थोडा आराम चाहता हूँ मैं .
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
इश्क बोला बंदे से के मत लगा मुझे गले से
के तू फ़ना और ख़ाक हो जायेगा
बंदा बोला के छोड़ नफरत करना
आ लग जा गले से के तू भी आबाद हो जायेगा
इश्क बोला के तू जनता नहीं मेरी ताकत को
कईयो को मौत के मुंह में छोड़ा है
बंदा बोला हँस के कि मेरी हिम्मत ने भी
हवाओ के रुख को मोड़ा है
इश्क बोला के मैं इक ज़लज़ला हूँ
और कहर की तरह से बरपूंगा
बंदा बोला मैंने भी सहे है दर्द बहुत
तेरी हस्ती है क्या तुझे अपने में समो लूँगा
इश्क बोला के तेरा नमो-निशां ना रहेगा
और तू ख़ाक में मिल जायेगा
बंदा बोला के मुझे डर नहीं है मौत का
मरने के बाद भी तो सादिक आशिक ही कहलाएगा
कलम :- हरमन बजवा ( मुस्तापुरिया )