Archive for the ‘HINDI’ Category

रोज नए चेहरो से मुलाकात होती है
जाने अन्जाने में बात भी होती है
सब फिरते है नकली चेहरा लिए हुए
कहाँ असलियत भी बयाँ होती है
मालूम नहीं कैसे जी लेते है लोग
दिखती नहीं पर सीने मैं आग होती है
हरमन जरा बच के चल राहें आसान नहीं
अपनों की नीयत भी बड़ी ख़राब होती है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
उतार चढाव तो ज़िन्दगी में चलते ही रहते है
कई बदलते है चेहरे कई ढंग बदलते रहते है
पड़ते ही कमजोर बादल मुश्किलों के बरसते रहते है
छोड़ देते है सब साथ बस बहाने घडते रहते है
चाहे कितनी ही आये आंधियां
फल दरख्तों पे लगते ही रहते है
ना हो बुरा मेरे किसी भी अपने का
ये दुआ ही हम रोज खुदा से करते रहते है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
चिराग तो जल रहे थे
मगर रोशिनी कहाँ थी
साँसे तो चल रही थी
मगर ज़िन्दगी कहाँ थी
आँखें तो बंद थी
मगर नींद कहाँ थी
धड़कन भी थी चल रही
मगर आवाज कहाँ थी
मंजिल तो थी सामने
रस्ते पर नज़र कहाँ थी
जिसके लिए खुद को भुला दिया
उसको खबर ही कहाँ थी
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कब तक अकेला चलेगा ऐ सादिक
आखिर तो दम टूट ही जायेगा
उम्मीद है जिनसे फूलो को पाने की
वो ही राहो में तेरे रोड़ा अटकाएगा
जो करते है अभी हमदर्दी का दिखावा
वो भी तुझ पर जुल्म ही ढाएगा
जो अपने है कई तेरे बरसो से
वो ही अंत में साथ छोड़ जाएगा
जो करते है दावा गम बटाने का
वो ही तुझ पर हस के दिखाएगा
जो चल रहे है कदम से कदम मिलाकर
मंजिल पर खुद को अकेला ही पाएगा
मत हो खफा के सबर का आँचल थाम ले
के तेरा जोर किसी पर न चल पाएगा
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
बईमानो की इस दुनिया में
किसको दिल का हाल सुनाए
जिस जिस पर किया है भरोसा हमनें
वो ही शक्श धोखा दे जाये
पल में अपने पल में पराए
पर्दा उठे तो राज खुल ही जाये
सब ताश के बिखरे पत्तो जैसे
क्या मालूम के बाज़ी कौन ले जाये
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कश्मकश में था यारो
फैसला ना कर सका
ना ही भूल पाया उसे
ना अपना बना के रख सका
राहें भी आसान थी
मंजिल भी थी सामने
कदम लड़खड़ा गए मेरे
चाहकर भी ना चल सका
फांसले भी थे कहाँ
दूरियां मिट गयी थी
आँखों ने की शरारत थी
मैं फिर भी कुछ ना समझ सका
अन्जान था इस खेल में
खिलाडी भी तो नया था
बाज़ी भी थी मेरे हाथ में
ना उस पल को संभाल के रख सका
बीता ज़माना गुजरे हुए वक़्त को
नए दौर का आलम सता रहा था
करना तो चाहता तो शुरुआत नयी
लेकिन वक़्त ना कभी निकाल सका
कश्मकश में था यारो
फैसला ना कर सका
ना ही भूल पाया उसे
ना अपना बना के रख सका
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
ज़िन्दगी हर पल इम्तिहान लेती है
सब कोशिशे नाकाम दिखाई देती है
मुसीबतें हर तरफ से घेर लेती है
वक़्त की घड़ियाँ तन्हाई को अंजाम देती है
मैं भी आज बिल्कुल टूट सा गया हूँ
खुद को इतना अकेला क्यूँ पा रहा हूँ
कल तक तो था चिराग रोशन मगर
ढलते सूरज की तरह डूबता क्यूँ जा रहा हूँ
कुछ हालात और वक़्त की पड़ी मार ऐसी
के अब मैं इसे और न झेल पा रहा हूँ
कहते है वक़्त भर देता है हर जखम को
फिर टूटे कांच की तरह बिखरता क्यूँ जा रहा हूँ
शायद किस्मत मैं लिखा था कुछ ऐसा होना
के मुझे पड़ेगा अब तमाम उम्र ही रोना
कोई दिख नहीं रहा अपना के दर्द बाँट लूँ
उजड़ा आशियाना छोड़कर ढून्ढ रहा हूँ अब कोई कोना
सीख लेता है इंसान खुद ही की गलतियों से
ना जाने हर बार “हरमन” फैसला गलत क्यूँ लेता है
ज़िन्दगी भर करता है रहता हालातो से समझोता
जिसको पाने के लिए दौड़ता है उसे ही खो देता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
ज़ख़्म भी हमें बार बार मिले
गिले शिकवे भी उनके हज़ार मिले
हमनें बांटी खुशियाँ हर पल
पर उनसे शिकायतों के हार मिले
हम रहे बुलाते दो पल साथ बैठने को
वो रात भर किसी और के साथ बहार मिले
वक़्त रहते पता चला के वो ही बेवफा है
फिर लोगो को हम ही क्यूँ गुन्हेगार मिले
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कभी मैं रात हूँ
कभी प्रभात हूँ
कभी किसी के लिए आशा हूँ
कभी किसी के लिए निराशा हूँ
कभी सैनिक हूँ मैदान-ऐ-जंग का
कभी शतरंज की बिसात हूँ
कभी लुटाया है मैंने खुद को
कभी औरो के लिए ख़ाक हूँ
कभी तो मैं जरिया हूँ
कभी ना पूरा होने वाला ख्वाब हूँ
कभी तो जलती हुई आग हूँ
कभी सर्द हवा का एहसास हूँ
कभी किसी के लिए हथियार हूँ
कभी पीठ पे हुआ वार हूँ
कभी बहता हुआ शीतल पानी हूँ
कभी टूटी दरख्तों से टाहनी हूँ
कभी तो बीती हुई कहानी हूँ
कभी आने वाली नयी जिंदगानी हूँ
कभी मिलने वाला सुन्हेरी मौका हूँ
कभी किसी के साथ हुआ धोखा हूँ
कभी चाँद की तरह दूर हूँ
कभी ज़माने का बना दस्तूर हूँ
कभी शम्मा का अफताब हूँ
कभी लो से बिछड़ा चिराग हूँ
कभी पहाड़ो की तरह विशाल हूँ
कभी आने वाला बुरा ख्याल हूँ
कभी चट्टान की तरह मजबूत हूँ
कभी ढूँढ रहा अपना वजूद हूँ
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
हमें लोगो ने जाना
टूटे हुए काँच के जैसा
कहीं जमीन पर बिखर कर
पैरो में न चुभ जाये
नासमझ है वो लोग
जिन्हें इस बात का एहसास नहीं
के पिसने के बाद भी तो
काँच बेशुमार काम आये
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )