इश्क बोला बंदे से के मत लगा मुझे गले से
के तू फ़ना और ख़ाक हो जायेगा
बंदा बोला के छोड़ नफरत करना
आ लग जा गले से के तू भी आबाद हो जायेगा
इश्क बोला के तू जनता नहीं मेरी ताकत को
कईयो को मौत के मुंह में छोड़ा है
बंदा बोला हँस के कि मेरी हिम्मत ने भी
हवाओ के रुख को मोड़ा है
इश्क बोला के मैं इक ज़लज़ला हूँ
और कहर की तरह से बरपूंगा
बंदा बोला मैंने भी सहे है दर्द बहुत
तेरी हस्ती है क्या तुझे अपने में समो लूँगा
इश्क बोला के तेरा नमो-निशां ना रहेगा
और तू ख़ाक में मिल जायेगा
बंदा बोला के मुझे डर नहीं है मौत का
मरने के बाद भी तो सादिक आशिक ही कहलाएगा
कलम :- हरमन बजवा ( मुस्तापुरिया )
खुदा ने माँगा हिसाब था
दाव पर लगा ईमान था
लोग भी थे खिलाफ मेरे
और में बेजुबान था
क्या देता जवाब में
आखिर में भी इंसान था
इक इक करके जब उठे परदे
चुप चाप खड़ा परेशान था
रहमत थी खुदा की मुझ पर
हर वक़्त तो वो मेहरबान था
तो पूछा फिर खुदा ने
क्यूँ दामन तेरा नापाक था
सर न उठा पाया मैं
किस बात का करता गुमान था
नजरे ना मिला पाया के
बेगुनाही का न कोई निशान था
आखिर खता मानी अपनीं
इस बात का इतमिनान था
ना मिली सजा ना मुफ़ किया
जाने कैसा खुदा का इन्साफ था ..
कलम :- हरमन बजवा ( मुस्तापुरिया )
ना कह पाया उनसे दिल की बात
वो भी ना समझ पाई मेरे जज्बात
आँखों ने भी की थी कुछ बात
शायद उस वक़्त ना थे सही हालात
कोशिशे तो की थी हरमन ने लगातार
शायद एक तरफ़ा ही था प्यार
क्यू की कई बार हुए थी तकरार
जब भी किया था मैंने इज़हार
कोई और ही था उनके दिल मैं
मैंने था ये अंदाज़ा लगाया
तभी तो सच्चा प्यार मेरा
उनका साथ ना ले पाया
ये समझा लेकिन बाद में बाजवा
सिर्फ पाना ही प्यार नहीं होता
रहे सलामत वो हर हाल में
जिनका दिल पे है इख्तियार होता.
लेखक :– हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
जो बनना चाहा था
वो ना कभी बन सका
और जो ना सोचा था कभी
वो आख़िरकार मैं बन गया
पर आज जो मैं बना हूँ
अपनों की मेहरबानी है
और जो कमी रह गए कहीं
अपनों की ही वो शैतानी है
खैर चलो जो भी हुआ
अब ज़िन्दगी यूँ ही बितानी है
खुद की तो बस्ती उजड़ गयी
पर औरो की मुझे बसानी है.
लेखक :– हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कोई उनसे उनकी बेरुखी का सबब पूछे
क्या गुजरती है हम पर यह हमसे पूछे
बैठे है मुह मोड़कर क्यूँ हमसे है रूठे
कैसे मनाये उन्हें ना कोई हल सूझे
लगा नहीं सकते अंदाज़ा वो मेरी चाहत का
रहते है हर वक़्त उनके ही ख्यालो में डूबे .
कलम :- हरमन बजवा ( मुस्तापुरिया )
हमें देखकर लोग न जाने
क्या सबक लेते है
शायद ग़लतफहमी में
मुझे गलत समझ लेते है
पूछते नहीं आकर के
आखिर सच्चाई क्या है
मेरी ख़ामोशी को वो शायद
मेरी रजा जान लेते है
कसूर उनका भी नहीं है
यह मैं भी जनता हूँ
बदल मायूसी के हर वक़्त जो
मेरे चेहरे पे छाये रहते है
कलम : हरमन बजवा ( मुस्तापुरिया )
मासूमियत ही तो है हथियार उनका
जिनसे रोज वो कतल करते है
बेक़सूर होते है मरने वाले
इलज़ाम फिर भी उनके सिर पड़ते है
अदा भी इस कदर से निराली है
सब हस के सूली चदते है
बाजवा वो इतने बेरहम है क्यूँ
ना जाने ये बोझ कैसे जरते है
वो करते नहीं रहम किसी पर भी
न ही खुदा के कहर का ख्याल करते है
ऐ हरमन हमें तो जीना है अभी और
तभी तो हुसन वालो से हम डरते है ..
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
इश्क कहते है बर्बाद कर देता है
खिले फूलो की बस्ती को उजाड़ कर देता है
लूट लेता है सब छोड़ता कुछ भी नहीं
बिना आग लगाए ही पल में राख कर देता है
इश्क में बदनाम हुए है लोग बहुत
पर कईयो को सरताज बना देता है
नहीं बिगड़ता कुछ भी जो करते है सौदेबाजीं
सच्ची मोहब्बत करने वालो को तो तबाह कर देता है
यार का अक्स देखते है खुदा की मूरत में
चेहरा वो ही दिखाई देता है उन्हें हर सूरत में
इश्क कर लेना आसान पर पाना मुश्किल होता है
छोड़ के सारे रस्मो रिवाज़ दुनिया को भुलाना होता है
नहीं रहता ख्याल खुद का के लोग दीवाना कहते है
न जाने आशिक प्यार में कैसे कैसे दर्द सहते है
प्यार करने वालो को बेशक जन्नत नसीब होती है
क्यूकि इस दुनिया में तो उनकी पल भर की हस्ती होती है
कई बिछ के राहों में यार की फिर भी कांटे कहलाते है
खुशकिस्मत है वो जो मंजिल को पा जाते है
बावजूद इसके “हरमन” लोग मोहब्बत करते है
चाहते है जिसे सादिक उसकी ख़ुशी में सूली चढ़ते है
नासमझ है वो “बाजवा” जो उनको समझ नहीं पाते
खुद होकर फना जो इश्क की है मशाल जला जाते .
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
तेरी सादगी पे मर मिटे है हम तो
तेरी सूरत का हर वक़्त दीदार करते है
तुझे पाने की हसरत ना जाने कब से है दिल में
जानशीन तुझ पे हम जान निसार करते है
तेरे हर शौंक का ख्याल भी है हमें
खुद की हर वक़्त कीमत लगाकर रखते है
रहे रोशन तेरा पहलू और राहगुज़र भी
इसीलिए खुद को जलाकर हम रखते है
ना यकीन हो मेरे इतबार का तुझे अगर
आ देख ले तेरा कब से इंतज़ार करते है
ना ब्यान हो सके जो मुद्दतो तक
जानेमन इतना तुझे हम प्यार करते है.
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया ).
ਦਰਦ ਬਥੇਰੇ ਨੇ ਇਸ ਦੁਨਿਯਾ ਵਿਚ
ਕਿਸ ਦੇ ਨਾਲ ਮੈਂ ਦਰਦ ਵੰਡਾਵਾ
ਦਰਦਾ ਵਾਲੀ ਚੱਕ ਕੇ ਗਠੜੀ
ਕਿਸ ਆਪਣੇ ਦੇ ਮੋਡ੍ਦੇ ਤੇ ਪਾਵਾ
ਆ ਕੇ ਬੇਹੇ ਕੋਈ ਕੋਲ ਮੇਰੇ
ਸੱਟਾ ਸੀਨੇ ਲੱਗਿਆ ਵਖਾਵਾ
ਕੋਈ ਦੇ ਦੇ ਦਵਾ ਪੀੜਾ ਦੀ
ਹਰਮਨ ਨਾ ਰੋਵਾ- ਕੁਰ੍ਲਾਵਾ.
ਕਲਮ :–  ਹਰਮਨ ਬਾਜਵਾ ( ਮੁਸਤਾਪੁਰੀਆ )