मौत ने कहा इंसान से
के मेरे नाम आते ही ज़ुबान पर
होश सबके ही उड़ने लगते है
जीते है जो खुश हो हो कर
मौत से पहले डरने लगते है
सादिक बोला मौत से
न जाने क्यों लोग डरते है
चेहरे सबके उतरने लगते है
हमको जीने का शौंक नहीं
ना ही हम मौत से डरते है
फिर कहा मौत ने
मेरी दहशत है ही इतनी
हर कोई घबरा जाता है
मेरा ख्याल आते ही
हर कोई पगला जाता है
सादिक बोला के
कुछ लोग ही रोते है याद करके
बाकि तो सब खुश होते है
फिर किस बात का खतरा है
ना जाने क्या ऐसा खोते है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

 

दोस्तों के संग बिताये वो दिन याद आते है
कॉलेज की पढाई को भी कहाँ भूल पाते है
न भूलता है वक़्त जो ऐसे ही गवाया था
माँ ने पिताजी की डांट से जब हमें बचाया था
एक ही बाईक़ पर तीन तीन सवार हो जाया करते थे
ना जाने कैसे कैसे करके तेल भरवाया करते थे
शहर की हर गली का चक्कर हमने जो लगाया था
कितनी ही लड़कियों पर किस्मत को अजमाया था
हर कोई चली जाती थी हमसे मुह मोड़कर
पर ना हार मानने का बीड़ा हमने उठाया था
सारा दिन निकलता था मौज मस्ती में
सब ही तो सवार थे एक ही कश्ती में
इधर उधर घूम के सारा दिन काट लेते थे
सारी खुशियाँ और गम आपस में बाँट लेते थे
हॉस्टल के रूम में महफ़िल रोज ही लगती थी
वो ही पुरानी बातें करके खूब मस्ती होती थी
पूरा था भरोसा हमें दोस्तों की दोस्ती पर
लड़ने को रहते थे हर वक़्त ही बेसबर
दिल करता था तो क्लास लगा लेते थे
वर्ना सारा वक़्त कैंटीन में बिता देते थे
गुज़र जाता था वक़्त यूँ ही बातें करके
रात को लौटते थे घर डेडी से डरते डरते
सारा साल हमारा बस यूँ ही गुज़र गया
इम्तिहान भी नक़ल मार के जैसे तैसे निकल गया
फिर आया वक़्त जिसका सभी को इंतज़ार था
कुछ ने कहा बस कुछ का आगे बढ़ने का विचार था
कुछ ने मनाई खुशियाँ कुछ का मातम वाला हाल था
क्यूकि फिर से लगने वाला उनका एक और साल था
हम भी निकल गए भीड़ में जिसका ना हमें इतबार था
ज़िन्दगी का एक नया दौर कर रहा जो इंतज़ार था
सब को अलविदा कहकर हम भी पीछे मुड़ गए
जान से प्यारे दोस्त मुझसे न जाने कहाँ बिछड़ गए
जान से प्यारे दोस्त मुझसे न जाने कहाँ बिछड़ गए …
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
ਜਦੋ ਕਰ ਨਾ ਸਕਿਆ ਹਾਸਿਲ ਤੈਨੂੰ
ਓੁਹਦੋ ਦਿਲ ਨੂੰ ਬੜਾ ਸਮਝਾਇਆ
ਨਾ ਮਿਲੀ ਥਾਂ ਕਬਰਾ ਵਿੱਚ ਵੀ
ਤੇਰੀ ਗਾਲੀ ਚ ਆਨ ਡੇਰਾ ਲਾਇਆ
ਕੱਡਦੇ ਕਸੀਦੇ ਲੰਘਦੇ ਲੋਕੀ
ਇਕ ਹੋਰ ਨੂੰ ਸਾਧ ਬਣਾਇਆ
ਇਸ ਚੰਦਰੇ ਹੁਸਨ ਦੇ ਕਹਿਰ ਨੇ ਤਾਂ
ਕਇਆ ਨੂੰ ਸੂਲੀ ਚੜਾਇਆ
ਕਹਿੰਦੇ ਹਰਮਨ ਮੁੜ ਜਾ ਵਾਪਿਸ
ਇਥੋ ਕਿਸੇ ਨਾ ਕੁਜ ਵੀ ਥਿਆਇਆ
ਲੱਖ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਭਾਵੇ ਕਰ ਕੇ ਵੇਖ ਲੈ
ਮੁੜ ਆਖੇਂਗਾ ਮੇਂ ਪਛਤਾਇਆ
ਲਾ ਇਲਾਜ਼ ਇਹ ਰੋਗ ਪੈੜ੍ਹਾ
ਕਿਉ ਜਿੰਦ ਨੂੰ ਐਂਵੇ ਲਾਇਆ
ਬਾਜਵਾ ਵੇ ਮੁਸਤਾਪੁਰ ਵਾਲਿਆ
ਇਸ਼ਕ਼ ਕਿਸੇ ਦੇ ਹੰਥ ਨਾ ਆਇਆ
ਕਲਮ :– ਹਰਮਨ ਬਾਜਵਾ ( ਮੁਸਤਾਪੁਰੀਆ )
कुछ ज़िन्दगी मेरी गुज़र गयी
तुम्हे अपना मुझे बनाने में

कुछ और ज़िन्दगी निकल गयी
प्यार साबित करके दिखाने में

फिर गुज़रा समां ना पता लगा
तुम्हे रूठे से मानाने में

बाकी बची थी जो ज़िन्दगी
वो बीती मेरी महखाने में

अब देर ना कर थोडा वक़्त बचा है
ऐ संग-दिल हरमन को दफ़नाने में

कलम :- हरमन  बाजवा  ( मुस्तापुरिया )

दिल में जो….

Posted: 07/01/2012 in HINDI
दिल में जो छुपा दर्द था
वो आज बहार निकल आया

कोशिश तो की थी बहुत मैंने
पर खुद को ना रोक पाया

कदम बढ़ गए अपने आप
पर ना मंजिल पर पहुच पाया

सोचा था दर्द बाँट लूँगा
पर किसी ने ना मुझे बुलाया

बड़ी मुश्किल थी वो घडी
यह रास्ता था जब अपनाया

खुशियों से मुह मोड़ के हरमन
बरबादियों में निकल आया

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

ना था एहसास दर्द का तुझको
इसी लिए तू सितम करती रही

नजरे छुपा कर बातें करना
औरो से छुप छुप के मिलती रही

वादे करना और फिर उन्हें तोड़ देना
तुने आदत कुछ ऐसी बनाई

कुछ भी ना रहा मेरे पास ऐ ज़ालिम
बची तो सिर्फ तेरी याद और मेरी ये तन्हाई

अब तू ही बता क्या नाम दूँ इसे
तेरी रुसवाई या फिर बेवफाई

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

इक ख्वाब देखा कल रात मैंने
जिसे पूरा करने की ख्वाहिश है

अभी तो इज़हार ऐ इश्क हुआ है
बाकी होनी आजमाईश है

तू हो कर रहना मेरी बस
ये ही तुझ से मेरी गुज़ारिश है

आकर सिमट जा मेरी बाँहों में
के वक़्त की भी ये फरमाईश है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

हर पल तुझ ही को याद करता हूँ
तेरी हर बात पर खुद को राख करता हूँ

मिटा देना चाहता हूँ खुद को तेरे इश्क में
इस्सी लिए तेरी हर गलती को माफ़ करता हूँ

करे तू भी कभी प्यार मुझे
खुदा से बस ये ही फरियाद करता हूँ

करते है तंग ज़माने वाले रोज ही मुझे
कुछ भी तो नहीं मैं ब्यान करता हूँ

तुझ ही को पाने की हसरत है दिल में मेरे
इसी लिए तो हर बार खुद ही को बर्बाद करता हूँ

कलम:- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
दवा दारू से ना काम चलेगा
मेरा मर्ज बहुत ही गहरा है

सब हकीमो ने भी दे दिया जवाब
जब से उसने फेरा चेहरा है

जा कर कह दो उस जालिम से
के उसकी याद का ही पहरा है

नहीं निकलेगा दम तब तक
जब तक वो मिलने ना आई

के उसकी हसरतो के शौंक पर ही तो
तमाम उम्र है मैंने अपनी गवाई

कलम:- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

शाम होते ही महफ़िल सजा लेता हूँ
जाम भर के लबालब होठों से लगा लेता हूँ

नहीं होता महखाने मैं कोई और
मैं खुद ही बोतल उठा लेता हूँ

होता हूँ हमेशा ही तनहा और अकेला मैं
साथ पीने को दर्दो को बुला लेता हूँ

हर दर्द अपनी कहानी सुना जाता है
बीता हुआ अतीत फिर से याद आ जाता है

कोशिश करता हूँ भुलाने की बहुत
ना चाहते हुए भी फिर से दर्द जगा जाता है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )