ਜੀ ਕਰਦਾ ਖੰਬ ਲਾ ਕੇ ਉੱਡ ਜਾਵਾਂ
ਮੁੜ ਧਰਤੀ ਤੇ ਨਾਂ ਪੈਰ ਲਾਵਾਂ
ਕਾਲੀਆਂ ਘਟਾਵਾਂ ਨੂੰ ਚੀਰਦਾ ਜਾਵਾਂ
ਓਸ ਉਚਾਈ ਨੂੰ ਵੀ ਛੂ ਕੇ ਆਵਾਂ
ਕੁਦਰਤ ਦਾ ਹਰ ਓਹ ਰਾਜ ਮੈਂ ਵੇਖਾ
ਦਿੱਤਾ ਰੱਬ ਦਾ ਤੋਹਫ਼ਾ ਨਾਯਾਬ ਮੈਂ ਵੇਖਾ
ਕੌਣ ਬਣਇਆ ਸਰਤਾਜ ਮੈਂ ਵੇਖਾ
ਕਿਹੜਾ ਅਰਸ਼ ਤੋ ਹੋਇਆ ਮੋਹਤਾਜ ਮੈਂ ਵੇਖਾ
ਕਿਤੇ ਦੂਰ ਉਡਾਰੀ “ਹਰਮਨ” ਮਾਰਾ
ਕੱਲਿਆ ਹੀ ਮੈਂ ਵਕ਼ਤ ਗੁਜ਼ਾਰਾ
ਕਦੇ ਵੀ ਕਿਸੇ ਤੋ ਨਾ ਹਾਰਾ
ਭਾਵੇ ਜੁੜ ਬਹਿਣਦਿਆ ਹੋਣ ਚਿੜੀਆਂ ਦੀਆਂ ਡਾਰਾਂ
ਨਾਲੇ ਵੇਖਾ ਕੌਣ ਮੇਰੇ ਲਈ ਰੋਵੇ
ਕਿਹੜਾ ਆਣ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਖਲੋਵੇ
ਕੌਣ ਦੁਖਾਂ ਦੀਆਂ ਪੰਡਾਂ ਢੋਵੈ
ਅਸਲੀ ਚੇਹਰੇ ਦੀ ਪਹਿਚਾਨ ਫੇਰ ਹੋਵੇ
ਹਰ ਕੋਈ ਆਣ ਕੇ ਹੱਕ ਜਤਾ ਜਾਂਦਾ
ਆਪਣਾ ਬਣ ਕੇ ਇਹਸਾਸ ਕਰਵਾ ਜਾਂਦਾ
ਭਾਵੇ ਹਨੇਰਿਆ ਨੂੰ ਮੇਰੇ ਮਿਟਾ ਜਾਂਦਾ
ਪਰ ਫੇਰ ਵੀ “ਬਾਜਵਾ ” ਕਿਉ ਘਬਰਾ ਜਾਂਦਾ
ਕਲਮ :- ਹਰਮਨ ਬਾਜਵਾ ( ਮੁਸਤਾਪੁਰਿਆ )
कश्मकश में था यारो
फैसला ना कर सका
ना ही भूल पाया उसे
ना अपना बना के रख सका
राहें भी आसान थी
मंजिल भी थी सामने
कदम लड़खड़ा गए मेरे
चाहकर भी ना चल सका
फांसले भी थे कहाँ
दूरियां मिट गयी थी
आँखों ने की शरारत थी
मैं फिर भी कुछ ना समझ सका
अन्जान था इस खेल में
खिलाडी भी तो नया था
बाज़ी भी थी मेरे हाथ में
ना उस पल को संभाल के रख सका
बीता ज़माना गुजरे हुए वक़्त को
नए दौर का आलम सता रहा था
करना तो चाहता तो शुरुआत नयी
लेकिन वक़्त ना कभी निकाल सका
कश्मकश में था यारो
फैसला ना कर सका
ना ही भूल पाया उसे
ना अपना बना के रख सका
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
ज़िन्दगी हर पल इम्तिहान लेती है
सब कोशिशे नाकाम दिखाई देती है
मुसीबतें हर तरफ से घेर लेती है
वक़्त की घड़ियाँ तन्हाई को अंजाम देती है
मैं भी आज बिल्कुल टूट सा गया हूँ
खुद को इतना अकेला क्यूँ पा रहा हूँ
कल तक तो था चिराग रोशन मगर
ढलते सूरज की तरह डूबता क्यूँ जा रहा हूँ
कुछ हालात और वक़्त की पड़ी मार ऐसी
के अब मैं इसे और न झेल पा रहा हूँ
कहते है वक़्त भर देता है हर जखम को
फिर टूटे कांच की तरह बिखरता क्यूँ जा रहा हूँ
शायद किस्मत मैं लिखा था कुछ ऐसा होना
के मुझे पड़ेगा अब तमाम उम्र ही रोना
कोई दिख नहीं रहा अपना के दर्द बाँट लूँ
उजड़ा आशियाना छोड़कर ढून्ढ रहा हूँ अब कोई कोना
सीख लेता है इंसान खुद ही की गलतियों से
ना जाने हर बार “हरमन” फैसला गलत क्यूँ लेता है
ज़िन्दगी भर करता है रहता हालातो से समझोता
जिसको पाने के लिए दौड़ता है उसे ही खो देता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
ਕਹਿੰਦੇ ਤੀਰ ਵਿਛੋੜੇ ਦਾ ਚੰਦਰਾ
ਰਾਤ ਔਖੀ ਲੰਘੋਉਣੀ ਤਾਰੇਆ ਦੇ ਨਾਲ
ਸਾਡੀ ਕਿੰਨੀ ਗੁਜਰੀ ਕਿੰਨੀ ਬਾਕੀ ਰਹਿ ਗਈ
ਲੱਗਾ ਪਤਾ ਨਾ ਤੇਰੇ ਝੂਠੇ ਲਾਰੇਆ ਦੇ ਨਾਲ
ਕੰਧਾ ਕਚੀਆਂ ਤੇ ਛੇਤੀ ਢਹਿ ਜਾਂਦੀਆਂ ਨੇ
ਮਹਿਲ ਖੜਦੇ ਜੋ ਉਸਰੇ ਸਹਾਰਿਆ ਦੇ ਨਾਲ
ਮਾਝਦਾਰ ਵਿਚ ਕਿਸ਼ਤੀਆਂ ਤੇ ਫਸਦੀਆਂ ਨੇ ਅਕਸਰ
ਮਾਝੀ ਓਹੀ ਜੋ ਲਾ ਦੇ ਕਿਨਾਰੇਆ ਦੇ ਨਾਲ
ਕਲਮ :- ਹਰਮਨ ਬਾਜਵਾ ( ਮੁਸਤਾਪੁਰਿਆ )
ਛੱਡਣ ਤੋ ਪਹਿਲਾ ਇਕ ਵਾਰ
ਨਜ਼ਰ ਹੀ ਮਾਰ ਲੈਂਦੀ
ਆਪਣੇ ਹਥਾਂ ਨਾਲ ਹੀ
ਮੈਨੂ ਸੂਲੀ ਚਾੜ ਦੇਂਦੀ
ਮਰਕੇ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਤਰੀਕੇ
ਸਾਨੂੰ ਭੋਰਾ ਵੀ ਚੈਨ ਨੀ ਆਇਆ
ਤੂੰ ਤਾ ਐਨੀ ਬੇਦਰਦ ਨਿਕਲੀ
ਇਕ ਅਥਰੂ ਵੀ ਨੀ ਬਹਾਇਆ
ਕਲਮ :- ਹਰਮਨ ਬਾਜਵਾ ( ਮੁਸਤਾਪੁਰਿਆ )
ज़ख़्म भी हमें बार बार मिले
गिले शिकवे भी उनके हज़ार मिले
हमनें बांटी खुशियाँ हर पल
पर उनसे शिकायतों के हार मिले
हम रहे बुलाते दो पल साथ बैठने को
वो रात भर किसी और के साथ बहार मिले
वक़्त रहते पता चला के वो ही बेवफा है
फिर लोगो को हम ही क्यूँ गुन्हेगार मिले
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कभी मैं रात हूँ
कभी प्रभात हूँ
कभी किसी के लिए आशा हूँ
कभी किसी के लिए निराशा हूँ
कभी सैनिक हूँ मैदान-ऐ-जंग का
कभी शतरंज की बिसात हूँ
कभी लुटाया है मैंने खुद को
कभी औरो के लिए ख़ाक हूँ
कभी तो मैं जरिया हूँ
कभी ना पूरा होने वाला ख्वाब हूँ
कभी तो जलती हुई आग हूँ
कभी सर्द हवा का एहसास हूँ
कभी किसी के लिए हथियार हूँ
कभी पीठ पे हुआ वार हूँ
कभी बहता हुआ शीतल पानी हूँ
कभी टूटी दरख्तों से टाहनी हूँ
कभी तो बीती हुई कहानी हूँ
कभी आने वाली नयी जिंदगानी हूँ
कभी मिलने वाला सुन्हेरी मौका हूँ
कभी किसी के साथ हुआ धोखा हूँ
कभी चाँद की तरह दूर हूँ
कभी ज़माने का बना दस्तूर हूँ
कभी शम्मा का अफताब हूँ
कभी लो से बिछड़ा चिराग हूँ
कभी पहाड़ो की तरह विशाल हूँ
कभी आने वाला बुरा ख्याल हूँ
कभी चट्टान की तरह मजबूत हूँ
कभी ढूँढ रहा अपना वजूद हूँ
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
हमें लोगो ने जाना
टूटे हुए काँच के जैसा
कहीं जमीन पर बिखर कर
पैरो में न चुभ जाये
नासमझ है वो लोग
जिन्हें इस बात का एहसास नहीं
के पिसने के बाद भी तो
काँच बेशुमार काम आये
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

Posted: 12/03/2012 in HINDI

ज़िन्दगी ऐसी क्यों होती है —
कभी हस्ती है
कभी रोती है
पहाड़ दुखो का ढोती है
तन्हा भी कभी होती है
खुद ही चुनती है राहें
खुद ही उन पर खोती है
अक्सर बैठ कर अकेले में
ये फुर्सत से क्यूँ रोती है
जिससे करती है प्यार बहुत
उस ही को ये खो देती है
मंजिल के होती है करीब मगर
फिर राहें क्यूँ खो देती है
जुल्म भी हँस के सहती है
जुल्मो का जवाब भी देती है
रहती तो है शोर शराबे में
खामोश फिर क्यूँ ये होती है
ज़िन्दगी ऐसी क्यूँ होती है–
फूलों की सेज बिछाती है
पर काँटों पर भी चलती है
चाहती तो है सब कुछ कहना
पर कुछ भी कहने से डरती है
होंसला भी देती है
मुसीबतों से लड़ने का
किस्मत के आगे ना जाने
फिर क्यूँ हार जाती है
वैसे तो देखा जाये तो
असल में ये प्यार चाहती है
जुदा होना भी अच्छा नहीं लगता
फांसले भी बना कर रखती है
खुली आँखों से देखना चाहती है सब कुछ
परदे भी गिरा कर रखती है
शोहरत भी पाना चाहती है लेकिन
बदनाम भी अक्सर ये होती है
ज़िन्दगी ऐसी क्यूँ होती है —
हसरतें तो बहुत है लेकिन
कुछ ही को पूरा कर पाती है
उड़ना भी चाहती है मगर
पर निचे भी गिर जाती है
हर वक़्त रखती है याद जिसे
वक़्त आने पर उसे भूल जाती है
सोचती तो है दोनों ही तरफ
पर फैसला कहाँ कर पाती है
कहना चाहती है सच लेकिन
साथ झूठ का कहाँ छोड़ पाती है
हार के हिम्मत हो के निराश
न जाने कमजोर क्यूँ हो जाती है
ज़िन्दगी नाम है जिन्दादिली का
फिर मायूस क्यूँ ये होती है
औरो के कर के चिराग रोशन
अंधेरो में क्यूँ ये खोती है
ज़िन्दगी ऐसी क्यूँ होती है …..!!
बहुत कम है ऐसे लोग ज़माने में
जिन्हें तूफानों से लड़ने का ढंग आता है
देखे है बहुत जो अपने ही साए से डर जाते है
हर कोई आंधियो से कहाँ बच पाता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )