ਮੈਂ ਦਿਲ ਨੂੰ ਬੜਾ ਸਮਝਾਇਆ
ਓਹਨੂੰ ਰੱਤਾ ਤਰਸ ਨਾ ਆਇਆ
ਜਦੋ ਪੱਲਾ ਸੀ ਓਹਨੇ ਛਡਾਇਆ
ਮੈਨੂੰ ਜਿਉਣਦਇਆ ਮਾਰ ਮੁਕਾਇਆ
ਮੈਂ ਆਪਣਾ ਸੀ ਓਹਨੂੰ ਬਣਾਇਆ
ਸਬ ਛਡ ਓਹਦੇ ਮਗਰ ਸੀ ਆਇਆ
ਓਹਨੇ ਕੋਡੀ ਵੀ ਨਾ ਮੁੱਲ ਪਾਇਆ
ਵਾਂਗ ਕੰਡਇਆ ਦੇ ਕੱਡ ਕੇ ਵਗਾਇਆ
ਬਾਜਵੇਇਆ ਇਹ ਹੁੰਦਾ ਸਦਾ ਆਇਆ
ਇਸ਼ਕ਼ ਹੁਸਨ ਨਾ ਇਕ ਥਾਂ ਸਮਾਇਆ
ਸਚ ਲੋਕਾ ਨੇ ਆਖ ਸੁਣਾਇਆ
ਰਾਹ ਮੁੜਣ ਦਾ ਨਾ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਥਯਾਇਆ
ਕਲਮ :- ਹਰਮਨ ਬਾਜਵਾ ( ਮੁਸਤਾਪੁਰਿਆ )
जलते हुए को देख कर
भी ना उनसे रहा गया
के पास आये मेरे और
हाथ सेक कर चल दिए
उम्मीद तो थी शायद
के मुझे बचा लेंगे
पर उन्हें कोई फर्क ना था
के कौन जल रहा था
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
उनकी अदा का जब महफ़िल मैं जिकर होता है
सीने मैं एक मीठा सा दर्द होता है
नाम आते है कईयो के फिर सामने
हर शक्श के चेहरे पर फिकर सा होता है
ना जाने किस वार से लूट लेती है ये
हर गुजरने वाला इनका मुरीद होता है
हरमन फिर गरीब कोई बेवजह से पकड़ा जाता है
असल मैं तो कत्ल इन्ही के हाथों से होता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
ਕੀ ਹੋਇਆ ਜੇ ਦਿਲ ਵਿਚੋ ਕੱਡਇਆ
ਭਾਵੇ ਤੂੰ ਮਾੜਾ ਵੀ ਸਦਾ ਆਖਇਆ
ਜੱਦ ਤੱਕ ਮੇਂ ਰਹੀ ਸੱਜਣਾ ਜਿਉਂਦੀ
ਨਹੀ ਕਿਸੇ ਵੱਲ ਵੀ ਕਦੇ ਝਾਕਇਆ
ਤੇਰੇ ਹਰ ਸ਼ੋਂਕ ਨੂੰ ਪੁਗਾਉਣ ਦੀ ਖਾਤਿਰ
ਸਿਹਾ ਸੱਬ ਕੁੱਜ ਮੁਹੋ ਕੁੱਜ ਨਾ ਆਖਇਆ

ਰਹੀ ਬੰਨ ਕੇ ਤੇਰੇ ਪੈਰਾਂ ਦੀ ਜੁੱਤੀ ਮੈਂ
ਖਾ ਠੋਕਰਾਂ ਤੇਰਾ ਕੁੱਜ ਵੀ ਨਾ ਵਿਗਾਡਇਆ

ਤੂੰ ਕਦੇ ਨੀ ਲਾਇਆ ਮਰਹਮ ਮੇਰੇ ਜਖਮਾ ਤੇ
ਤੇਰਾ ਸੁਖ ਹਰ ਵੇਲੇ ਰੱਬ ਕੋਲੋ ਅਰਦਾਸਇਆ

ਪਰ ਕੀ ਹੋਇਆ ਤੂੰ ਕਹਿ ਤਾ ਮੈਨੂੰ ਜੇ ਗੈਰ
ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਸੀ ਚੜਦੀ ਸੁਵੇਰ ਤੇ ਢਾਲਦੀ ਦੋਪਹਿਰ
ਹਰ ਪਲ ਮੰਗੀ ਸੋਹਣਇਆ ਵੇ ਤੇਰੀ ਹੀ ਖੈਰ
ਭਾਵੇ ਵੱਸ ਗਿਆ ਤੂੰ ਜਾ ਕੇ ਕਿਸੇ ਗੈਰ ਦੇ ਸ਼ਹਿਰ
ਕਲਮ :- ਹਰਮਨ ਬਾਜਵਾ ( ਮੁਸਤਾਪੁਰਿਆ )

Posted: 21/04/2012 in PUNJABI

सपने में देखा तो लोग ईमान बदल रहे थे
नकली अपनी शख्शियत की पहचान बदल रहे थे
सबका बने विश्वास वो जुबान बदल रहे थे
जो सचाई के थे साथ वो पैगाम बदल रहे थे
कुछ ऐसे भी थे लोग वहां जो अरमान बदल रहे थे
ज़माने से जो खड़े थे पैरो के निशान बदल रहे थे
सब देख रह था “हरमन” पर कुछ भी न कर पाया
क्यूँ की जिनको थी उम्मीद उनके अंजाम बदल रहे थे
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
रोज नए चेहरो से मुलाकात होती है
जाने अन्जाने में बात भी होती है
सब फिरते है नकली चेहरा लिए हुए
कहाँ असलियत भी बयाँ होती है
मालूम नहीं कैसे जी लेते है लोग
दिखती नहीं पर सीने मैं आग होती है
हरमन जरा बच के चल राहें आसान नहीं
अपनों की नीयत भी बड़ी ख़राब होती है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
उतार चढाव तो ज़िन्दगी में चलते ही रहते है
कई बदलते है चेहरे कई ढंग बदलते रहते है
पड़ते ही कमजोर बादल मुश्किलों के बरसते रहते है
छोड़ देते है सब साथ बस बहाने घडते रहते है
चाहे कितनी ही आये आंधियां
फल दरख्तों पे लगते ही रहते है
ना हो बुरा मेरे किसी भी अपने का
ये दुआ ही हम रोज खुदा से करते रहते है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
चिराग तो जल रहे थे
मगर रोशिनी कहाँ थी
साँसे तो चल रही थी
मगर ज़िन्दगी कहाँ थी
आँखें तो बंद थी
मगर नींद कहाँ थी
धड़कन भी थी चल रही
मगर आवाज कहाँ थी
मंजिल तो थी सामने
रस्ते पर नज़र कहाँ थी
जिसके लिए खुद को भुला दिया
उसको खबर ही कहाँ थी
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
कब तक अकेला चलेगा ऐ सादिक
आखिर तो दम टूट ही जायेगा
उम्मीद है जिनसे फूलो को पाने की
वो ही राहो में तेरे रोड़ा अटकाएगा
जो करते है अभी हमदर्दी का दिखावा
वो भी तुझ पर जुल्म ही ढाएगा
जो अपने है कई तेरे बरसो से
वो ही अंत में साथ छोड़ जाएगा
जो करते है दावा गम बटाने का
वो ही तुझ पर हस के दिखाएगा
जो चल रहे है कदम से कदम मिलाकर
मंजिल पर खुद को अकेला ही पाएगा
मत हो खफा के सबर का आँचल थाम ले
के तेरा जोर किसी पर न चल पाएगा
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
बईमानो की इस दुनिया में
किसको दिल का हाल सुनाए
जिस जिस पर किया है भरोसा हमनें
वो ही शक्श धोखा दे जाये
पल में अपने पल में पराए
पर्दा उठे तो राज खुल ही जाये
सब ताश के बिखरे पत्तो जैसे
क्या मालूम के बाज़ी कौन ले जाये
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )