मैं फिरा हूँ इश्क की गलियों में
तन्हाई के सिवा कुछ नहीं मिला
लाख ठोकरें खाई हैं मैंने यहाँ
मुझे फिर भी उनसे नहीं कोई गिला
ढूँढा बहुत मैंने इश्क को
सही पता पर उसका नहीं मिला
बरसो तक सींचा मैंने पर
बूटा प्यार का फिर भी नहीं खिला
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )