मजबूरी का नाम ले कर

Posted: 22/12/2012 in HINDI
मजबूरी का नाम ले कर अक्सर लोग बहाने बना लेते है
होता है एक ही तीर पर कई निशाने बना लेते है
हुस्न वाले कातिल अदाओ से दीवाने बना लेते है
कुछ बन जाते है अपने कुछ को बैगाने बना लेते है
कुछ छोड़ नहीं पाते महफ़िल को तमाम उम्र
कुछ रोज ही नए ठिकाने बना लेते है
कुछ रखते है याद बचपन के भी दोस्तों को
कुछ लोग रोज ही नए फ़साने बना लेते है
कुछ लूट कर औरो की मलकियत को
खुद अपने नए घराने बना लेते है
कुछ करते है जाहिर ना-समझ खुद को
वक़्त आने पर ऐसे हालात सियाने बना लेते है
कुछ लुटाते है अपने दोनों हाथो से
कुछ छुपाने को दौलत तहखाने बना लेते है
कुछ रहते है कैद किसी और के ख्यालो मैं
कुछ औरो के लिए कैद खाने बना लेते है
कुछ रहते है नापते रिश्तो को माप-तोल मैं
कुछ निभाने को उनको अलग पैमाने बना लेते है
कुछ सीख नहीं पाते समझाने के बावजूद भी
कुछ जरा सी नसीहत को ता-उम्र पैगाम बना लेते है
कुछ रहते है महलो मैं गरीबो की तरह
कुछ सादगी से झोपड़ो को आलीशान बना लेते है
कुछ रखते हैं छुपा कर दिलो मैं नफरते
कुछ पहली ही नज़र मैं पहचान बना लेते है
कुछ जीत नहीं पाते कोशिशो के बाद भी
कुछ होंसलो से ऊँचाइयो के नए आयाम बना लेते है
कुछ उठाते है मोल खतरे आसान राहो मैं
कुछ मुश्किल राहो को भी आसान बना लेते है
कुछ ढूंढते रहते है खुदा को हर तरफ
कुछ अपने अंदर ही उसका मुकाम बना लेते है
कुछ रखते है अपनी शकशियत को अच्छाई की और
कुछ बुरे कर्मो से खुद को शैतान बना लेते है
कुछ तोड़ते हैं कलियों को खिलने से पहले
कुछ औरो के गुलशन को गुलिस्तान बना लेते है
कुछ रखते है फर्क दिल मैं जात मज्हबो का
कुछ इंसानियत दिखा के खुद को इंसान बना लेते है
कुछ लोगो पर असर करती है ये सब बातें
कुछ लोग बस बात इसे आम बना लेते है
कुछ करते है मदद ऐ “हरमन” खुले दिल से
कुछ जरा सी को ज़िन्दगी भर का एहसान बना देते है
“मुस्तापुरिया” ये कमबख्त हालात चीज़ है ऐसी
के बुरे को अच्छा और अच्छे को बुरा इंसान बना देते है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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