आग लगी थी चारो तरफ
सब कुछ जल रहा था
मेरा लुट गया था सब कुछ
उसका दिल ना पिघल रहा था
क्या देख कर ना जाने वाहा
उसका चेहरा खिल रहा था
मेरी साँसे थम रही थी
उसको सुकून मिल रहा था
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )