बेरुखी से इतनी

Posted: 17/07/2012 in HINDI
बेरुखी से इतनी वो रुक्सत हुए
और हमें भी तन्हा छोड़ गए
खुद ही था रुलाया बे-तहाशा
खुद ही आंसू पोंछ गए
आप तो ना जाने वो सुखी थे
मेरे दुखो से मुह मोड़ गए
ना बाँध सका फिर से हरमन
धागा रिश्तो का ऐसा तोड़ गए
कलम:- हरमन बाजवा (मुस्तापुरिया )

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