ज़माने का देखा है …

Posted: 29/04/2012 in HINDI
ज़माने का देखा है
मैंने एक दस्तूर
जिसने की कोशिश उठने की
वो दबा है बदस्तूर
समझो तो आज़ाद परिंदा है
ना समझो तो मजबूर
दिखती हो मंजिल जब सामने
होती है असल में दूर
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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