कभी मैं रात हूँ
कभी प्रभात हूँ
कभी किसी के लिए आशा हूँ
कभी किसी के लिए निराशा हूँ
कभी सैनिक हूँ मैदान-ऐ-जंग का
कभी शतरंज की बिसात हूँ
कभी लुटाया है मैंने खुद को
कभी औरो के लिए ख़ाक हूँ
कभी तो मैं जरिया हूँ
कभी ना पूरा होने वाला ख्वाब हूँ
कभी तो जलती हुई आग हूँ
कभी सर्द हवा का एहसास हूँ
कभी किसी के लिए हथियार हूँ
कभी पीठ पे हुआ वार हूँ
कभी बहता हुआ शीतल पानी हूँ
कभी टूटी दरख्तों से टाहनी हूँ
कभी तो बीती हुई कहानी हूँ
कभी आने वाली नयी जिंदगानी हूँ
कभी मिलने वाला सुन्हेरी मौका हूँ
कभी किसी के साथ हुआ धोखा हूँ
कभी चाँद की तरह दूर हूँ
कभी ज़माने का बना दस्तूर हूँ
कभी शम्मा का अफताब हूँ
कभी लो से बिछड़ा चिराग हूँ
कभी पहाड़ो की तरह विशाल हूँ
कभी आने वाला बुरा ख्याल हूँ
कभी चट्टान की तरह मजबूत हूँ
कभी ढूँढ रहा अपना वजूद हूँ