ना ही कोई जमीन है
ना ही कोई जायदाद
ना ही मेरे सिर पर कोई
सजा हुआ है ताज
वक़्त बुरा है चल रहा
हर शेय को हूँ मोहताज
लाखो सवाल है लोगो के
नहीं मेरे पास कोई जवाब
सब्र का बाँध अभी टूटा नहीं
पर हालात तो है ख़राब
खुदा की रहमत पाने को
मैं कब से हूँ बेताब
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )