गुजर रह हूँ नाजुक हालातो से
और वक़्त भी साथ नहीं दे रहा
टूटा हूँ जैसे आसमान से तारा
जो किसी को दिखाई नहीं दे रहा
बन गया हूँ खिलोने के जैसा
होर कोई मुझसे है खेल रहा
सब चले गए है साथ छोड़कर
मैं फिर भी सब कुछ झेल रहा
माना के ऐसा भी होता है अक्सर
जैसे खुद को कोई बेच रहा
खुशियाँ तो बीती हँस हँस के
अब दुःख भी दस्तक है दे रहा
होगा ना मुनासिब अब सोच के ये
क्यों पीछे मुड़ मुड़ के मैं देख रहा
जब होगी छाओं तब मिल ही जाएगी
फिलहाल तो धूप मैं सेक रहा
कलम : हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )