शाम होते ही महफ़िल….

Posted: 02/01/2012 in HINDI
शाम होते ही महफ़िल सजा लेता हूँ
जाम भर के लबालब होठों से लगा लेता हूँ

नहीं होता महखाने मैं कोई और
मैं खुद ही बोतल उठा लेता हूँ

होता हूँ हमेशा ही तनहा और अकेला मैं
साथ पीने को दर्दो को बुला लेता हूँ

हर दर्द अपनी कहानी सुना जाता है
बीता हुआ अतीत फिर से याद आ जाता है

कोशिश करता हूँ भुलाने की बहुत
ना चाहते हुए भी फिर से दर्द जगा जाता है

कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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