ना था एहसास दर्द का तुझको
इसी लिए तू सितम करती रही
नजरे छुपा कर बातें करना
औरो से छुप छुप के मिलती रही
वादे करना और फिर उन्हें तोड़ देना
तुने आदत कुछ ऐसी बनाई
कुछ भी ना रहा मेरे पास ऐ ज़ालिम
बची तो सिर्फ तेरी याद और मेरी ये तन्हाई
अब तू ही बता क्या नाम दूँ इसे
तेरी रुसवाई या फिर बेवफाई
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )