इक ख्वाब देखा कल रात मैंने
जिसे पूरा करने की ख्वाहिश है
अभी तो इज़हार ऐ इश्क हुआ है
बाकी होनी आजमाईश है
तू हो कर रहना मेरी बस
ये ही तुझ से मेरी गुज़ारिश है
आकर सिमट जा मेरी बाँहों में
के वक़्त की भी ये फरमाईश है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )