धुआं सा उठ रह था…..

Posted: 14/12/2011 in HINDI
धुआं सा उठ रह था
के मनो कुछ जल रह था
मेरा चमन उजाड़ गया
लोगो का दिल बेहाल रह था
ना इस बात का था गुमान
के अपना कोई बिछड़ रह था
बस ऐसे लग रह था मनो
सांस होले होले उखड रह था
रोया था उस लम्हे को याद करके
दिल अभी भी मेरा तड़प रह था
पल भर में हुआ तबाह सब कुछ ऐसे
के होश मेरा अभी तक ना संभल रह था
फिरता रह हरमन बदहवास होकर
ना जाने कब से भटक रह था
बदल गया जैसे सब एक ही रात में
ना जाने वक़्त कैसे गुज़र रह था .
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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